सनातन धर्म 

‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’
अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। 
सनातन का अर्थ है जो शाश्वत हो, सदा के लिए सत्य हो। जिन बातों का शाश्वत महत्व हो वही सनातन कही गई है। जैसे सत्य सनातन है। ईश्वर ही सत्य है, आत्मा ही सत्य है, मोक्ष ही सत्य है और इस सत्य के मार्ग को बताने वाला धर्म ही सनातन धर्म भी सत्य है। वह सत्य जो अनादि काल से चला आ रहा है और जिसका कभी भी अंत नहीं होगा वह ही सनातन या शाश्वत है। जिनका न प्रारंभ है और जिनका न अंत है उस सत्य को ही सनातन कहते हैं। यही सनातन धर्म का सत्य है।
अनन्तविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारकापीठाश्वर
जगत्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के परमप्रिय शिष्य
ब्रह्मचारी श्री नारायणानंद जी महाराज
उपाध्यक्ष, द्वारका विद्यासभा, देवभूमि द्वारका, गुजरात
Shri Narayananand ji Maharaj

धर्म-योग क्या है?

धर्म योग एक जीवन प्रणाली है, धर्म योग एक जीवन की संजीवनी है। संजीवनी का अर्थ होता है – कि व्यक्ति जीता है। धर्म योग यह वह शक्ति है जो व्यक्तियों को ……  read more

देवभूमि द्वारका की ऐतिहासिक जानकारी

श्री द्वारिकाधीश का स्थान मथुरा, वृंदावन और भगवान की क्रिड़ास्थली वृंदावन है, मथुरा है, लेकिन भगवान का कार्यस्थली द्वारका है। जब भगवान ने कंस …..  read more

सनातन धर्म सबसे श्रेष्ठ क्यों ?

सनातन धर्म की बात करें तो यह धर्म विश्व के सभी धर्मों से पुराना धर्म हैं और सनातनन धर्म वेदों पर आधारित है, जो अपने अन्दर विभिन्न तरह की उपासना पद्धतियां, सम्प्रदाय, मत और  दर्शनों को समेटे हुए है। अगर हम इसके अनुयायियों की बात करें तो संख्या के आधार पर विश्व में तीसरा सबसे बड़ा धर्म हमारा सनातन धर्म आता है, हालांकि सनातन धर्मीं सर्वाधक संख्या में भारत में ही हैं। सनातन धर्म अनादिकाल से आज भी विद्यमान हैं।
सनातन धर्म का उद्भव अथवा निर्माण ज्ञान से हुआ है और ज्ञान ही इसका स्वरूप है। हमारे वेदों के रूप में इसमें परम ब्रह्म सदैव विद्यमान रहता है। सनातन धर्म का निर्माण ज्ञान के साथ-साथ वर्षों की साधना और अध्ययन से हुआ है। सनातन धर्म के अनुसार जीव चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता है और जीव को मनुष्य योनी बड़े पुण्यों के बाद प्राप्त होती है। इस जन्म के बाद उसका पुनर्जन्म होता है। जन्म-मरण के इसी चक्र को ही संसार-चक्र कहा जाता है। जीवन के इस संसार-चक्र में मनुष्य के साथी के रूप में धर्म-ज्ञान और कर्म दोनों रूपों में साथ ही होता है। वर्तमान जन्म मनुष्य को जिस कर्म की वजह से प्राप्त होता है उसे ‘प्रारब्ध’ कहा जाता है। प्रारब्ध के अतिरिक्त अन्य पूर्वजन्मों को ‘संचित’ कहा जाता है। इस जन्म में जो भी कर्म किए जाते हैं उन्हें क्रियमाण कहा जाता है, जिनका फल हमें अगले जन्म के रूप में प्राप्त होता है। इसलिए सनातन धर्म को कर्मवाद के सिद्धान्त वाला माना जाता है। जिसमें मनुष्य इस जीवन में अच्छे कर्म कर स्वयं के आने वाले अगले जीवन को संवारने का प्रयास करता है। सनातन धर्म के अनुसार कर्म और उसके फल का संयोग करने वाला ईश्वर कण-कण में व्याप्त है। ईश्वर के अनेकों रूप व नाम हैं, किन्तु उन सबका ईश्वरतत्व एक ही है।
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