देवभूमि द्वारका की ऐतिहासिक जानकारी

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श्री द्वारिकाधीश का स्थान मथुरा, वृंदावन और भगवान की क्रिड़ास्थली वृंदावन है, मथुरा है, लेकिन भगवान का कार्यस्थली द्वारका है। जब भगवान ने कंस को मथुरा से हटाया उनका वध किया और उग्रसैन को मथुरा का राजा बनाया, तो कंस के ससुर मग्धराज श्रीनरेश जरासंध ने भगवान के ऊपर बार-बार (17 बार) आक्रमण किया। 17 बार जब आक्रमण हुआ तो मग्धनरेश को यह मालूम था कि भगवान द्वारिकाधीश की शक्ति कहां है – भगवान द्वारिकाधीश की शक्ति है ब्राह्मण, गाय, वेद यह सब उनकी शक्ति हैं तो उन्होंने ब्राह्मणों को बंदी बनाया। बंदी बनाने के बाद उन्होंने यह कहा कि अगर इस बार हम लोग मथुरा को नहीं जीत पाए तो इन सारे ब्राह्मणों के सर को कलम कर देना। तो इन सभी ब्राह्मणों ने भगवान से प्रार्थना की कि प्रभु हमारी रक्षा कीजिए। भगवान ही मन ही मन विचार कर लिया कि इस बार अपने लोगों को युद्ध नहीं करना है तो भगवान ने अपने मन से संकल्प करके विश्वकर्मा को बुलाया और द्वारिका नगरी का निर्माण कराया। जो यह द्वारिका आज भी है। तो जब वहां युद्ध करने लगे तो युद्ध करते-करते बलराम जी से भगवान ने कहा कि भैय्या इस बार यहां से भागने में ही अपनी भलाई है क्योंकि भगवान जो अवतार होता है वह मनुष्यों के लिए होता है गायों के लिए होता है। धर्म की रक्षा के लिए होता है और यदि धर्म की रक्षा करनी है तो कुछ भी किया जाए। तब से भगवान का नाम पड़ा रणछोडऱाय। तब रणछोडऱाय द्वारिका में आए तो द्वारिकानगरी उस समय भी सर्वोत्तकृष्ट नगरी थी और आज भी सर्वोत्तकृष्ट नगरी है यह सतयुग से लेकरआज कलयुग तक भगवान जब-जब आते हैं तो यह रयवैतांचल पर्वत है। जब भगवान का नगर द्वारिका नगरी को समुद्र में भगवान के आदेश से ले जा रहा था तब समुद्र ने मन-मन अपने ईष्ट को प्रार्थना की कि – हे प्रभु बड़ी मुश्किल से तो कोई हमारे किनारे आकर वास करता है और आपने हमको ऐसा वैभव, ऐसा ऐश्वर्य प्रदान किया तो उन्होंने सारी द्वारिका को समुद्र में लिया, लेकिन आज की जो द्वारिका है इसको उन्होंने समुद्र में नहीं लिया। भागवत में यह एक प्रमाण मिलता है कि भगवान व्यास जी कहते हैं कि भगवान के महल को छोडक़र समुद्र ने सारी द्वारिका को अपने गर्भ में ले लिया। सारी द्वारिका नष्ट हो गई, लेकिन भगवान का महल रह गया। यह द्वारिका नगरी वही भगवान का महल है और इस द्वारिका नगरी को यह वरदान प्राप्त है कि भगवान यहां नित्य निवास करते हैं, नित्य भगवान का आगमन यहां होता है। इसका सामयिक परिणाम और सामयिक चमत्कार तब देखने को मिला जब सन् 1971 का भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ। तब पाकिस्तान ने यहां बहुत से तोप के गोले डाले और पाकिस्तान का रेडियो यह कह रहा था कि द्वारिका नगरी जल रही है परन्तु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतने बम गिरने के बावजूद द्वारिका नगरी में कोई जनहानी नहीं हुई और तोप के गोले फटे ही नहीं, इनमें से 5 बम आज भी जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज द्वारा संचालित संस्कृत एकेडमी में आज भी सुरक्षित रखे हुए हैं। तो यह वही प्राचीन द्वारिका है। नगर वासियों ने भगवान द्वारिकाधीश का साक्षात प्रत्यक्ष किया कि भगवान द्वारिकाधीश यहां नित्य निवास करते हैं। यह नगरी त्रैयो को सुंदर कही जाती है यहां का वातावरण, यहां के निवासी, यहां के पशु, यहां के पक्षी, यहां के लोग, यहां पर आकर दर्शन करने वाले। भगवान द्वारिकाधीश का मंदिर बहुत छोटा है, लेकिन जैसे-जैसे भक्त बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे यहां की नगरी अपने आप अपना कलेवर बढ़ाती चली जाती है। यह ऐसी भूमि है जिस भूमि को दर्शन करने के लिए देवता भी आते हैं। द्वारिकाधीश का मंदिर जो आज यहां पर है यह पश्चिमाविमुख है। भगवान द्वारकानाथ की जो दृष्टि है वह पश्चिम की ओर है। अस्त होते सूर्य की ओर है और हर जगह लोग कहते हैं यह अस्तांचल की ओर जाते हुए, लेकिन भगवान कहते हैं कि सूर्य उदयकाल में भी उनका ऐश्वर्य रहता है और अस्तांचल की ओर भी उनका ऐश्वर्य रहता है। इस स्थान को कुशस्थली भी कहते हैं। इसका नाम कुशस्थली है क्योंकि एक कथा ऐसी है कि जब कुश नाम के एक राक्षस ने यहां पर ऋषियों, मुनियों, ब्राह्मणों, गायों को त्रस्त किया तो भगवान यहां आए और उन्होंने कुश को मारना चाहा तो वह मर ही नहीं रहा था तो ऐसी स्थिति में भगवान ने उसके बल को हीन करने के लिए नीचे गाढ़ दिया और उसके अराध्य भगवान शिव हैं तो उस पर भगवान शिव को स्थापित कर दिया। इस पर राक्षस ने कहा कि आप हमें मार भी रहे हैं और इस प्रकार की गति भी दे रहे हैं तो भगवान करुणा में आ गए और बोले – क्या चाहते हो तुम? तो उसने भगवान से कहा कि आपके चरण में ही हम रहे। तो भगवान ने उसे ऐसा आशीर्वाद  दिया कि द्वारिका में जो मेरे दर्शन के लिए आएगा तो वह कुशेश्वर भगवान का दर्शन नहीं करेगा तो उसे पूर्ण दर्शन का फल नहीं मिलेगा। यहां द्वारिकाधीश का जो मंदिर है इसमें गोमती घाट से लेकर 56 सीढिय़ां चढ़ते हुए व्यक्ति स्वर्ग द्वार से प्रवेश करता है। इस मंदिर में दो द्वार है एक स्वर्ग द्वार, जिससे वह प्रवेश करता है और मोक्ष द्वार जिससे वह मंदिर परिसर से निकलता है। इन द्वारों में 56 सीढिय़ां हैं इनका अर्थ है कि 56 कोटि यदुवंशी यहां निवास करते हैं। द्वारका का बहुत बड़ा क्षेत्र था। भगवान द्वारकाधीश का महल वह 40 किलोमीटर परिधी में था। इतना बड़ा द्वारका भगवान ने बसाया था। आज भी जो मंदिर है इसमें 56 सीढिय़ों की एक-एक सीढ़ी एक-एक कोटि यदुवंशियों की स्मृति दिलाती है। स्वर्ग द्वार से भक्त मंदिर परिसर में प्रवेश कर भगवान के दर्शन करता है। भारतवर्ष में केवल द्वारिका ही है जहां पर अष्टपटरानियों के साथ में भगवान का निवास होता है। अष्टपटरानियों का मंदिर यहां पर है। भगवान द्वारिकानाथ सबसे पहले माता रुकमणी के हाथों से माखन मिश्री का भोग लेते हैं, यहां भक्त माता से अपनी मनोकामना करते हैं और माता भगवान से भक्तों की मनोकामना को बताती हैं। व्यक्ति जैसे ही स्वर्ग द्वार से प्रवेश करता है तो स्वर्ग का सुख मिलता है और मोक्ष द्वार से निकल जाता है। मोक्ष द्वार के पास ही कुशेश्वर भगवान – शिवलिंग स्थापित है। हमारे ग्रंथ द्वारिका नगरी को 5000 वर्ष पुरानी बताते हैं। द्वारिका ऐसी भूमि है जो प्रेम की भूमि है। यहां राधाकृष्ण का मंदिर भी है।
ब्रह्माचारी श्री नारायणानन्द जी महाराज
उपाध्यक्ष, शारदापीठ्म, द्वारका, गुजरात

Dharma yog

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